जब भी खबरों में जीडीपी वृद्धि सुनते हैं तो अक्सर सवाल आता है — यह मेरे लिए क्यों मायने रखती है? जीडीपी (Gross Domestic Product) देश में एक तय अवधि में बनी कुल चीज़ों और सेवाओं का मूल्य बताती है। वृद्धि का मतलब है कि अर्थव्यवस्था बड़ी रही है — यानी रोजगार, निवेश और कारोबार में आम तौर पर सुधार होता है।
पर क्या हर बार बढ़ती जीडीपी का मतलब सबके लिए फायदेमंद होता है? नहीं। कभी-कभी वृद्धि असमान होती है: कुछ सेक्टर तेजी से बढ़ते हैं जबकि दूसरे पीछे रह जाते हैं। इसलिए सिर्फ प्रतिशत देखकर खुश होना सही नहीं।
जीडीपी तीन तरीकों से नापा जाता है — उत्पादन (सेक्टर अनुसार), खर्च (घरेलू खर्च, निवेश, सरकारी खर्च, और शुद्ध निर्यात) और आय (मजदूरी, मुनाफा)। इन तरीकों से मिलने वाले आंकड़े मिलाकर ही समग्र वृद्धि निकलती है।
सरकार और स्टैटिस्टिक्स संस्थान तिमाही या वार्षिक आधार पर ये डेटा जारी करते हैं। तिमाही में अचानक बढ़ोतरी या गिरावट बाजार और नीतिनिर्धारण पर तेज असर डाल सकती है, जबकि दीर्घकालिक रुझान बात करते हैं कि अर्थव्यवस्था स्थायी रूप से कितनी तेज बढ़ रही है।
सरल भाषा में: चार बड़ी चीजें — खपत (लोग कितना खर्च कर रहे हैं), निवेश (कारोबार और सरकार कितना निवेश कर रहे हैं), सरकार की नीतियाँ (बजट, कर, सब्सिडी), और विदेशी माँग (निर्यात)। इसके अलावा प्राकृतिक आपदाएँ, वैश्विक मंदी, और मौद्रिक नीति (RBI की दरें) भी असर डालती हैं।
उदाहरण के तौर पर, अगर निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ता है तो नौकरियां बनेंगी और घरेलू मांग मजबूत होगी, जिससे जीडीपी वृद्धि तेज हो सकती है। वहीँ, अगर महँगाई बढ़ती है तो खरीदारी कम होगी और वृद्धि धीमी पड़ सकती है।
आप एक आम पाठक के रूप में किन संकेतों पर ध्यान दें? रोजगार-रिपोर्ट, औद्योगिक उत्पादन, खुदरा बिक्री, बैंक ऋण वृद्धि और सरकारी बुनियादी ढांचे के प्रोजेक्ट। बजट में निवेश और सब्सिडी के फैसले भी अगले साल की वृद्धि का संकेत देते हैं।
क्या निवेश करने या नौकरी बदलने का निर्णय जीडीपी पर आधारित होना चाहिए? सीधे नहीं। जीडीपी दिशा बताती है, पर व्यक्तिगत निर्णयों के लिए सेक्टरल जॉब ट्रेंड, कंपनी की सेहत और आपकी वित्तीय स्थिति ज्यादा मायने रखते हैं।
अंत में, जीडीपी वृद्धि एक बड़ा संकेतक है पर उसे समझना चाहिए — किस सेक्टर से आ रही है, क्या वह मजबूती स्थायी है, और उसका महंगाई व रोज़गार पर क्या प्रभाव होगा। खबर में दिखने वाला प्रतिशत सिर्फ शुरुआत है; असली कहानी आंकड़ों के पीछे की शेयर्ड होती है।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने 8 अगस्त, 2024 को अपनी ताजा द्विमासिक बैठक आयोजित की और रेपो दर को 6.5% पर अपरिवर्तित रखा। वर्तमान आर्थिक हालात और मुद्रास्फीति प्रवृत्तियों को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया। आरबीआई ने वित्त वर्ष 25 के लिए जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 7.2% लगाया।